न हों, तो झांकी देखने जाय ही कौन- सभी तो आपकी तरह योगी और तपस्वी नहीं हैं।'
रमेश--'मेरा वश चले, तो मैं कानून से यह दुराचार बंद कर दूं। खैर, फुरसत हो तो आओ एक-आधा बाज़ी हो जाय।'
रमानाथ--'और आया किसलिए हूं; मगर आज आपको मेरे साथ ज़रा सर्राफ तक चलना पड़ेगा। यों कई बडी-बडी कोठियों से मेरा परिचय है; मगर आपके
रहने से कुछ और ही बात होगी।'
रमेश--'चलने को चला चलूंगा, मगर इस विषय में मैं बिलकुल कोरा हूं।न कोई चीज बनवाई न खरीदी। तुम्हें क्या कुछ लेना है?'
रमानाथ--'लेना-देना क्या है, ज़रा भाव-ताव देखूंगा।'
रमेश--'मालूम होता है, घर में फटकार पड़ी है।'
रमानाथ--'जी, बिलकुल नहीं। वह तो जेवरों का नाम तक नहीं लेती। मैं कभी पूछता भी हूं, तो मना करती हैं, लेकिन अपना कर्तव्य भी तो कुछ है। जब से गहने चोरी चले गए, एक चीज़ भी नहीं बनी।'
हो चुकी थी, केवल छत पर रूका हुआ पानी टपक रहा था। आख़िर वह उसी बिस्तर के बंडल पर बैठ गई और बोली--तुमने मुझे कसम क्यों दिलाई?रमा के ह्रदय में आशा की गुदगुदी हुई। बोला--इसके सिवा मेरे पास तुम्हें रोकने का और क्या उपाय था?
जालपा--क्या तुम चाहते हो कि मैं यहीं घुट-घुटकर मर जाऊं?
रमानाथ--तुम ऐसे मनहूस शब्द क्यों मुंह से निकालती हो? मैं तो चलने को तैयार हूं, न मानोगी तो पहुंचाना ही पड़ेगा। जाओ, मेरा ईश्वर मालिक है, मगर कम-से-कम बाबूजी और अम्मां से पूछ लो।