जालपा ने उसे देखते ही पूछा, 'मेरी चिट्ठियां छोड़ तो नहीं दीं? '
रमा ने बहाना किया, 'अरे इनकी तो याद ही नहीं रही। जेब में पड़ी रह गई।'
जालपा-'यह बहुत अच्छा हुआ। लाओ, मुझे दे दो, अब न भेजूंगी।'
रमानाथ-'क्यों, कल भेज दूंगा।'
जालपा-'नहीं, अब मुझे भेजना ही नहीं है, कुछ ऐसी बातें लिख गई थी,जो मुझे न लिखना चाहिए थीं। अगर तुमने छोड़ दी होती, तो मुझे दुःख होता। मैंने तुम्हारी निंदा की थी। यह कहकर वह मुस्कराई।
रमानाथ-'जो बुरा है, दगाबाज है, धूर्त है, उसकी निंदा होनी ही चाहिए।'
जालपा ने व्यग्र होकर पूछा-'तुमने चिट्ठियां पढ़लीं क्या?'
रमा ने निद्यसंकोच भाव से कहा,हां, यह कोई अक्षम्य अपराध है?'
जालपा कातर स्वर में बोली,तब तो तुम मुझसे बहुत नाराज होगे?'
आंसुओं के आवेग से जालपा की आवाज़ रूक गई। उसका सिर झुक गया
के पास क्या काई का खजाना रक्खा हुआ है? अभी चारपांच हज़ार खर्च किए हैं, फिर कहां से लाकर गहने बनवा दें? दस-बीस हज़ार रूपये होंगे, तो अभी तो बच्चे भी तो सामने हैं और नौकरी का भरोसा ही क्या पचास रू. होता ही क्या है?
रमानाथ--मैं तो मुसीबत में फंस गया। अब मालूम होता है, कहीं नौकरी करनी पड़ेगी। चैन से खाते और मौज उडाते थे, नहीं तो बैठे-बैठाए इस मायाजाल में फंसे। अब बतलाइए, है कहीं नौकरी-चाकरी का सहारा?
रमेश ने ताक पर से मुहरे और बिसात