पीछे दुबक गया। जालपा दालान में आकर बोली, 'ज़रा यहां आना जी, ओ सर्राफ! लूटने आए हो, या माल बेचने आए हो! '
चरनदास बरामदे से उठकर द्वार पर आया और बोला, 'क्या हुक्म है, सरकार।
जालपा-'माल बेचने आते हो, या जटने आते हो? सात सौ रूपये कंगन के मांगते हो? '
चरनदास-'सात सौ तो उसकी कारीगरी के दाम हैं, हूजूर! '
जालपा-'अच्छा तो जो उस पर सात सौ निछावर कर दे, उसके पास ले जाओ। रिंग के डेढ़सौ कहते हो, लूट है क्या? मैं तो दोनों चीज़ों के सात सौ
से अधिक न दूंगी।
चरनदास-'बहूजी, आप तो अंधेर करती हैं। कहां साढ़े आठ सौ और कहां सात सौ? '
जालपा-'तुम्हारी खुशी, अपनी चीज़ ले जाओ।'
चरनदास-'इतने बडे दरबार में आकर चीज़ लौटा ले जाऊं?' आप यों ही पहनें। दस-पांच रूपये की बात होती, तो आपकी ज़बान ने उधरता।
रहेगा। अभी पार्सल तैयार हुआ जाता है, हाल ही लौटा दो। एक क्षण में पार्सल तैयार हो गया और रमा उसे लिये हुए चिंतित भाव से नीचे चला।
अध्याय 2
ग्यारह
महाशय दयानाथ को जब रमा के नौकर हो जाने का हाल मालूम हुआ, तो बहुत खुश हुए। विवाह होते ही वह इतनी जल्द चेतेगा इसकी उन्हें आशा न थी। बोले--'जगह तो अच्छी है। ईमानदारी से काम करोगे, तो किसी अच्छे पद पर पहुंच जाओगे। मेरा यही उपदेश है कि पराए पैसे को हराम समझना।'
रमा के जी में आया