या गपशप करके रमणियां दिल बहला लिया करतीं।कभी किसी के घर, कभी किसी के घर, गागुन में पंद्रह दिन बराबर गाना होता रहा। जालपा ने जैसा रूप पाया था, वैसा ही उदार ह्रदय भी पाया था। पान-पत्तों का ख़र्च प्रायः उसी के मत्थे पड़ता। कभी-कभी गायनें बुलाई जातीं, उनकी सेवा-सत्कार का भार उसी पर था। कभी-कभी वह स्त्रियों के साथ गंगा-स्नान करने जाती, तांगे का किराया और गंगा-तट पर जलपान का ख़र्च भी उसके मत्थे जाता। इस तरह उसके दो-तीन रूपये रोज़ उड़ जाते थे। रमा आदर्श पति था। जालपा अगर मांगती तो प्राण तक उसके चरणों पर रख देता। रूपये की हैसियत ही क्या थी? उसका मुंह जोहता रहता था। जालपा उससे इन जमघटों की रोज़ चर्चा करती। उसका स्त्री-समाज में कितना आदर-सम्मान है, यह देखकर वह फूला न समाता था।
एक दिन इस मंडली को सिनेमा देखने की धुन सवार हुई।
रमा ने अरूचि प्रकट करते हुए कहा--'गंदा काम है, मैं सगाई से काम करना चाहता हूं।'
बूढ़े मियां ने हंसकर कहा--'अभी गंदा मालूम होता है, लेकिन फिर इसी में मज़ा आएगा।'
खां साहब को विदा करके रमा अपनी कुर्सी पर आ बैठा और एक चपरासी से बोला--'इन लोगों से कहो, बरामदे के नीचे चले जाएं । एक-एक करके नंबरवार आवें, एक कागज पर सबके नाम नंबरवार लिख लिया करो।'
एक बनिया, जो दो घंटे से खडा था, खुश होकर बोला--'हां सरकार, यह बहुत अच्छा होगा।'