थी, पर जालपा अपने सादे आवरण में उनसे कोसों आगे थी। उसके सामने एक भी नहीं जंचती थी। यह मेरे पूर्व कर्मो का फल है कि मुझे ऐसी सुंदरी मिली। आख़िर यही तो खाने-पहनने और जीवन का आनंद उठाने के दिन हैं। जब जवानी ही में सुख न उठाया, तो बुढ़ापे में क्या कर लेंगे! बुढ़ापे में मान लिया धन हुआ ही तो क्या यौवन बीत जाने पर विवाह किस काम का- साड़ी और घड़ी लाने की उसे धुन सवार हो गई। रातभर तो उसने सब्र किया। दूसरे दिन दोनों चीजें लाकर ही दम लिया। जालपा ने झुंझलाकर कहा, 'मैंने तो तुमसे कहा था कि इन चीज़ों का काम नहीं है। डेढ़सौ से कम की न होंगी?
रमानाथ-'डेढ़सौ! इतना फजूल-ख़र्च मैं नहीं हूं।'
जालपा-'डेढ़सौ से कम की ये चीज़ें नहीं हैं।'
जालपा ने घड़ी कलाई में बांधा ली और साड़ी को खोलकर मंत्रमुग्ध नजरों से देखा।
रमानाथ-'तुम्हारी कलाई पर यह घड़ी कैसी खिल रही है! मेरे रूपये वसूल हो गए।
जालपा ने मुंह उधर लिया, कोई उत्तर न दिया।
रमा ने फिर कहा--'यहां अकेले पड़े-पड़े तुम्हारा जी घबराता रहा होगा! '
जालपा ने तीव्र स्वर में कहा--'तुम कहते हो, मैंने गलती की, मैं समझती हूं, मैंने अच्छा किया। वहां किसके मुंह में कालिख लगती।'
जालपा ताना तो न देना चाहती थी, पर रमा की इन बातों ने उसे उत्तेजित कर दिया। रोष का एक कारण यह भी था कि उसे अकेली छोड़कर सारा घर उत्सव देखने चला गया। अगर उन लोगों के ह्रदय होता, तो क्या वहां जाने से इंकार न कर देते?