जालपा-'सच बताओ, कितने रूपये ख़र्च हुए?

रमानाथ-'सच बता दूं- एक सौ पैंतीस रूपये। पचहत्तर रूपये की साड़ी, दस के जूते और पचास की घड़ी।'

जालपा-'यह डेढ़सौ ही हुए। मैंने कुछ बढ़ाकर थोड़े कहा था, मगर यह सब रूपये अदा कैसे होंगे? उस चुडै।ल ने व्यर्थ ही मुझे निमांण दे दिया। अब मैं बाहर जाना ही छोड़ दूंगी।'

रमा भी इसी चिंता में मग्न था, पर उसने अपने भाव को प्रकट करके जालपा के हर्ष में बाधा न डाली। बोला,सब अदा हो जायगा। जालपा ने तिरस्कार के भाव से कहां,कहां से अदा हो जाएगा, ज़रा सुनूं। कौड़ी तो बचती नहीं, अदा कहां से हो जायगा? वह तो कहो बाबूजी घर का ख़र्च संभाले हुए हैं, नहीं तो मालूम होता। क्या तुम समझते हो कि मैं गहने और साडियों पर मरती हूं? इन चीज़ों को लौटा आओ। रमा ने प्रेमपूर्ण नजरों से कहा, 'इन चीज़ों को रख लो। फिर तुमसे बिना पूछे कुछ न लाऊंगा।'


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रमा ने लज्जित होकर कहा--'कालिख लगने की तो कोई बात न थी, सभी जानते हैं कि चोरी हो गई है, और इस ज़माने में दो-चार हज़ार के गहने बनवा लेना, मुंह का कौर नहीं है।'

चोरी का शब्द ज़बान पर लाते हुए, रमा का ह्रदय धड़क उठा। जालपा पति की ओर तीव्र दृष्टि से देखकर रह गई। और कुछ बोलने से बात बढ़ जाने का भय था, पर रमा को उसकी दृष्टि से ऐसा भासित हुआ, मानो उसे चोरी का रहस्य मालूम है और वह केवल संकोच के कारण उसे खोलकर नहीं कह


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