रमेश-'नहीं, अभी तो चला आ रहा हूं। क्या वकील साहब के यहां गए थे?'
रमा-'जी हां, तीन रूपये की चपत पड़ गई।'
रमेश-'कोई हरज़ नहीं, यह रूपये वसूल हो जाएंगे। बडे आदमियों से राहरस्म हो जाय तो बुरा नहीं है, बड़े-बडे काम निकलते हैं। एक दिन उन लोगों को भी तो बुलाओ।'
रमा-'अबकी इतवार को चाय की दावत दे आया हूं।'
रमेश-'कहो तो मैं भी आ जाऊं। जानते हो न वकील साहब के एक भाई इंजीनियर हैं। मेरे एक साले बहुत दिनों से बेकार बैठे हैं। अगर वकील साहब उसकी सिफारिश कर दें, तो ग़रीब को जगह मिल जाय। तुम ज़रा मेरा इंट्रोडक्शन करा देना, बाकी और सब मैं कर लूंगा। पार्टी का इंतजाम ईश्वर ने चाहा, तो ऐसा होगा कि मेमसाहब ख़ुश हो जाएंगी। चाय के सेट, शीशे के रंगीन गुलदानऔर फानूस मैं ला दूंगा। कुर्सियां, मेज़ें, फर्श सब मेरे ऊपर छोड़ दो। न कुली की जरूरत, न मजूर की। उन्हीं मूसलचंद को रगेदूंगा।'
रमानाथ--'वेश्याएं न हों, तो झांकी देखने जाय ही कौन- सभी तो आपकी तरह योगी और तपस्वी नहीं हैं।'
रमेश--'मेरा वश चले, तो मैं कानून से यह दुराचार बंद कर दूं। खैर, फुरसत हो तो आओ एक-आधा बाज़ी हो जाय।'
रमानाथ--'और आया किसलिए हूं; मगर आज आपको मेरे साथ ज़रा सर्राफ तक चलना पड़ेगा। यों कई बडी-बडी कोठियों से मेरा परिचय है; मगर आपके
रहने से कुछ और ही बात होगी।'
रमेश--'चलने को चला चलूंगा, मगर इस विषय में मैं बिलकुल कोरा हूं।न कोई चीज बनवाई न खरीदी। तुम्हें क्या कुछ लेना है?'