रमानाथ-'तब तो बडा मज़ा रहेगा। मैं तो बडी चिंता में पडा हुआ था।'
रमेश-'चिंता की कोई बात नहीं, उसी लौंडे को जोत दूंगा। कहूंगा, जगह चाहते हो तो कारगुजारी दिखाओ। फिर देखना, कैसी दौड़-धूप करता है।'
रमानाथ-'अभी दो-तीन महीने हुए आप अपने साले को कहीं नौकर रखा चुके हैं न?'
रमेश-'अजी, अभी छः और बाकी हैं। पूरे सात जीव हैं। ज़रा बैठ जाओ, ज़रूरी चीज़ों की सूची बना ली जाए। आज ही से दौड़-धूप होगी, तब सब चीजें जुटा सकूंगा। और कितने मेहमान होंगे? '
रमानाथ-'मेम साहब होंगी, और शायद वकील साहब भी आएं।'
रमेश-'यह बहुत अच्छा किया। बहुत-से आदमी हो जाते, तो भभ्भड़ हो जाता। हमें तो मेम साहब से काम है। ठलुओं की ख़ुशामद करने से क्या फायदा? '
दोनों आदमियों ने सूची तैयार की। रमेश बाबू ने दूसरे ही दिन से सामान जमा करना
रमानाथ--'लेना-देना क्या है, ज़रा भाव-ताव देखूंगा।'
रमेश--'मालूम होता है, घर में फटकार पड़ी है।'
रमानाथ--'जी, बिलकुल नहीं। वह तो जेवरों का नाम तक नहीं लेती। मैं कभी पूछता भी हूं, तो मना करती हैं, लेकिन अपना कर्तव्य भी तो कुछ है। जब से गहने चोरी चले गए, एक चीज़ भी नहीं बनी।'
रमेश--'मालूम होता है, कमाने का ढंग आ गया। क्यों न हो, कायस्थ के बच्चे हो कितने रूपये जोड़ लिए? '
रमानाथ--'रूपये किसके पास हैं, वादे पर लूंगा। '