भिजवा दे, कोई ऐसा मित्र भी नज़र नहीं आता था, जो उसके नाम फर्जी तार भेज देता। वह इन्हीं चिंताओं में करवटें बदल रहा था कि जालपा की आंख खुल गई। रमा ने तुरंत चादर से मुंह छिपा लिया, मानो बेखबर सो

रहा है। जालपा ने धीरे से चादर हटाकर उसका मुंह देखा और उसे सोता पाकर ध्यान से उसका मुंह देखने लगी। जागरण और निद्रा का अंतर उससे छिपा न रहा। उसे धीरे से हिलाकर बोली, 'क्या अभी तक जाग रहे हो?'

रमानाथ-'क्या जाने, क्यों नींद नहीं आ रही है। पड़े-पड़े सोचता था, कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर चला जाऊं। कुछ रूपये कमा लाऊं।'

जालपा-'मुझे भी लेते चलोगे न?'

रमानाथ-'तुम्हें परदेश में कहां लिये-लिये फिरूंगा? '

जालपा-'तो मैं यहां अकेली रह चुकी। एक मिनट तो रहूंगी नहीं। मगर जाओगे कहां? '

रमानाथ-'अभी कुछ निश्चय नहीं कर सका हूं।'

जालपा-'तो


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जालपा ने व्यग्र होकर पूछा-'तुमने चिट्ठियां पढ़लीं क्या?'

रमा ने निद्यसंकोच भाव से कहा,हां, यह कोई अक्षम्य अपराध है?'

जालपा कातर स्वर में बोली,तब तो तुम मुझसे बहुत नाराज होगे?'

आंसुओं के आवेग से जालपा की आवाज़ रूक गई। उसका सिर झुक गया और झुकी हुई आंखों से आंसुओं की बूंदें आंचल पर फिरने लगीं। एक क्षण में उसने स्वर को संभालकर कहा,'मुझसे बडा भारी अपराध हुआ है। जो चाहे सज़ा दो; पर मुझसे अप्रसन्न मत हो ईश्वर जानते हैं, तुम्हारे जाने के बाद मुझे कितना दुःख हुआ। मेरी कलम से न जाने कैसे ऐसी बातें निकल गई।'


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