कोई विकार उत्पन्न हो जाता है, तो उसे याद आती है कि कल मैंने पकौडियां खाई थीं। विजय बहिर्मुखी होती है, पराजय अन्तर्मुखी। जालपा ने पूछा, 'कहां चले गए थे, बडी देर लगा दी।'

रमानाथ-'तुम्हारे कारण रतन के बंगले पर जाना पड़ा। तुमने सब रूपये उठाकर दे दिए, उसमें दो सौ रूपये मेरे भी थे। '

जालपा-'तो मुझे क्या मालूम था, तुमने कहा भी तो न था, मगर उनके पास से रूपये कहीं जा नहीं सकते, वह आप ही भेज देंगी।'

रमानाथ-'माना, पर सरकारी रकम तो कल दाख़िल करनी पड़ेगी।'

जालपा-'कल मुझसे दो सौ रूपये ले लेना, मेरे पास हैं।'

रमा को विश्वास न आया। बोला-'कहीं हों न तुम्हारे पास! इतने रूपये कहां से आए? '

जालपा-'तुम्हें इससे क्या मतलब, मैं तो दो सौ रूपये देने को कहती हूं।'

रमा का चेहरा खिल उठा। कुछ-कुछ आशा बंधी। दो-सौ रूपये यह


236 of 724



जालपा-'जट्टू है कोई, हमें इन दामों लेना ही नहीं।

रमा की चाल उल्टी पड़ी, जालपा को इन चीज़ों के मूल्य के विषय में बहुत धोखा न हुआ था। आख़िर रमा की आर्थिक दशा तो उससे छिपी न थी, फिर वह सात सौ रूपये की चीजों के लिए मुंह खोले बैठी थी। रमा को क्या मालूम था कि जालपा कुछ और ही समझकर कंगन पर लहराई थी। अब तो गला छूटने का एक ही उपाय था और वह यह कि दलाल छः सौ पर राज़ी न हो बोला, 'वह साढ़े आठ से कौड़ी कम न लेगा।'

जालपा-'तो लौटा दो।'


236 of 1194