की चिंता में रमा को नहाने-खाने की भी सुध न रही। कहार अंदर गया, तो जालपा ने पूछा, 'तुम्हें कुछ काम-धंधो की भी ख़बर है कि मटरगश्ती ही करते रहोगे! दस बज रहे हैं, और अभी तक तरकारी-भाजी का कहीं पता नहीं?'

कहार ने त्योरियां बदलकर कहा, 'तो का चार हाथ-गोड़ कर लेई! कामें से तो गवा रहिनब बाबू मेम साहब के तीर रूपैया लेबे का भेजिन रहा।'

जालपा-'कौन मेम साहब?'

कहार-' 'जौन मोटर पर चढ़कर आवत हैं।'

जालपा-'तो लाए रूपये?'

कहार -'लाए काहे नाहींब पिरथी के छोर पर तो रहत हैं, दौरत-दौरत गोड़ पिराय लाग।'

जालपा-'अच्छा चटपट जाकर तरकारी लाओ।'

कहार तो उधर गया, रमा रूपये लिये हुए अंदर पहुंचा तो जालपा ने कहा, 'तुमने अपने रूपये रतन के पास से मंगवा लिए न? अब तो मुझसे न लोगे?'

रमा ने उदासीन भाव से कहा, 'मत दो!'


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जालपा-'रूपये तो अम्मांजी देंगी? '

रमानाथ-'क्या कुछ कहती थीं? '

जालपा-'उन्होंने मुझे भेंट दिए हैं, तो रूपये कौन देगा? '

रमा ने उसके भोलेपन पर मुस्कराकर कहा, यही समझकर तुमने यह चीज़ें ले लीं ? अम्मां को देना होता तो उसी वक्त दे देतीं जब गहने चोरी गए थे।क्या उनके पास रूपये न थे?'

जालपा असमंजस में पड़कर बोली, तो मुझे क्या मालूम था। अब भी तो लौटा सकते हो कह देना, जिसके लिए लिया था, उसे पसंद नहीं आया। यह कहकर उसने तुरंत कानों


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