दयानाथ ने रमा को पुकारा और बोले, 'देखो, किस सेठ का आदमी आया है। उसका कुछ हिसाब बाकी है, साफ क्यों नहीं कर देते?कितना बाकी है इसका?'

रमा कुछ जवाब न देने पाया था कि प्यादा बोल उठा, 'पूरे सात सौ हैं, बाबूजी!'

दयानाथ की आंखें फैलकर मस्तक तक पहुंच गई, 'सात सौ! क्यों जी,यह तो सात सौ कहता है?'

रमा ने टालने के इरादे से कहा, 'मुझे ठीक से मालूम नहीं।'

प्यादा-'मालूम क्यों नहीं। पुरजा तो मेरे पास है। तब से कुछ दिया ही नहीं,कम कहां से हो गए।'

रमा ने प्यादे को पुकारकर कहा, 'चलो तुम दुकान पर, मैं ख़ुद आता हूं।'


प्यादा-'हम बिना कुछ लिए न जाएंगे, साहब! आप यों ही टाल दिया करते हैं, और बातें हमको सुननी पड़ती हैं।'

रमा सारी दुनिया के सामने जलील बन सकता था, किंतु पिता के सामने जलील बनना उसके लिए मौत से कम


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कहां था? उसकी दशा ठीक उस माता की-सी थी, जो अपने बालक को विदेश जाने की अनुमति दे रही हो वही विवशता, वही कातरता, वही ममता इस समय जालपा के मुख पर उदय हो रही थी। रमा उसके हाथ से केसों को ले सके, इतना कडा संयम उसमें न था। उसे तकाज़े सहना, लज्जित होना, मुंह छिपाए फिरना, चिंता की आग में जलना, सब कुछ सहना मंजूर था। ऐसा काम करना नामंजूर था जिससे जालपा का दिल टूट जाए, वह अपने को अभागिन समझने लगे। उसका सारा ज्ञान, सारी चेष्टा,


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