रमानाथ-'तुम तो कहीं जाने को तैयार बैठी हो ।'

जालपा-'सेठानीजी ने बुला भेजा है, दोपहर तक चली आऊंगी।'

रमा की दशा इस समय उस शिकारी की-सी थी, जो हिरनी को अपने शावकों के साथ किलोल करते देखकर तनी हुई बंदूक कंधो पर रख लेता है,और वह वात्सल्य और प्रेम की क्रीडादेखने में तल्लीन हो जाता है। उसे अपनी ओर टकटकी लगाए देखकर जालपा ने मुस्कराकर कहा, 'देखो,

मुझे नज़र न लगा देना। मैं तुम्हारी आंखों से बहुत डरती हूं।'

रमा एक ही उडान में वास्तविक संसार से कल्पना और कवित्व के संसार में जा पहुंचा। ऐसे अवसर पर जब जालपा का रोम-रोम आनंद से नाच रहा है, क्या वह अपना पत्र देकर उसकी सुखद कल्पनाओं को दलित कर देगा? वह कौन ह्रदयहीन व्याधा है, जो चहकती हुई चिडिया की गर्दन पर छुरी चला देगा? वह कौन अरसिक आदमी है, जो किसी प्रभात-द्दसुम


283 of 724

तो ऐसा कंगन कितने दिन में बना देगा! रतन ऐसा ही कंगन बनवाना चाहती हैं।'

रमा ने तत्परता से कहा-'हां, बना क्यों नहीं सकता इससे बहुत अच्छे बना सकता है।-'

रतन-'इस जोड़े के क्या लिए थे? '

जालपा-'आठ सौ के थे।'

रतन-'कोई हरज़ नहीं, मगर बिलकुल ऐसा ही हो, इसी नमूने का।'

रमा-'हां-हां, बनवा दूंगा। '

रतन- 'मगर भाई, अभी मेरे पास रूपये नहीं हैं।

रूपये के मामले में पुरूष महिलाओं के सामने कुछ नहीं कह सकता क्या वह


283 of 1194