जागेश्वरी से बोली, 'वह तो अब तक नहीं आए। आप चलकर भोजन कर लीजिए।'

जागेश्वरी बैठे-बैठे झपकियां ले रही थी। चौंककर बोली, 'कहां चले गए थे? '

जालपा-'वह तो अब तक नहीं आए।'

जागेश्वरी--'अब तक नहीं आए? आधी रात तो हो गई होगी। जाते वक्त तुमसे कुछ कहा भी नहीं?'

जालपा-'कुछ नहीं।'

जागेश्वरी--'तुमने तो कुछ नहीं कहा?'

जालपा-'मैं भला क्यों कहती।'

जागेश्वरी--'तो मैं लालाजी को जगाऊं?'

जालपा-'इस वक्त ज़गाकर क्या कीजिएगा? आप चलकर कुछ खा लीजिए न।'

जागेश्वरी--'मुझसे अब कुछ न खाया जायगा। ऐसा मनमौजी लड़का है कि कुछ कहा न सुना, न जाने कहां जाकर बैठ रहा। कम-से-कम कहला तो देता कि मैं इस वक्त न आऊंगा।'

जागेश्वरी फिर लेट रही, मगर जालपा उसी तरह बैठी रही। यहां तक कि सारी रात गुज़र गई,पहाड़-सी रात जिसका एक-एक पल एक-एक वर्ष के समान कट रहा था।


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महिला की चीज़ है, उन्होंने पेशगी रूपये दिए थे। सोचो, मैं उन्हें क्या मुंह दिखाऊंगा। मुझसे अपने रूपयों के लिए पुरनोट लिखा लो, स्टांप लिखा लो और क्या करोगे? '

गंगू-'पुरनोट को शहद लगाकर चाटूंगा क्या? आठ-आठ महीने का उधार नहीं होता। महीना, दो महीना बहुत है। आप तो बडे आदमी हैं, आपके लिए पांच-छः सौ रूपये कौन बडी बात है। कंगन तैयार हैं।'

रमा ने दांत पीसकर कहा, 'अगर यही बात थी तो तुमने एक महीना पहले क्यों न कह दी? अब तक मैंने रूपये की कोई फिक्र की होती न!'


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