गैर ही अच्छे।आंखों में आंसू भरकर बोली, 'अभी तो कुछ पता नहीं चला बहन! '
रतन-'यह बात क्या हुई, कुछ तुमसे तो कहा-सुनी नहीं हुई?'
जालपा-'ज़रा भी नहीं, कसम खाती हूं। उन्होंने नोटों के खो जाने का मुझसे ज़िक्र ही नहीं किया। अगर इशारा भी कर देते, तो मैं रूपये दे देती। जब वह दोपहर तक नहीं आए और मैं खोजती हुई दफ्तर गई, तब मुझे मालूम हुआ, कुछ नोट खो गए हैं। उसी वक्त जाकर मैंने रूपये जमा कर दिए।'
रतन-'मैं तो समझती हूं, किसी से आंखें लड़ गई। दस-पांच दिन में आप पता लग जायगा। यह बात सच न निकले, तो जो कहो दूं।'
जालपा ने हकबकाकर पूछा, 'क्या तुमने कुछ सुना है?'
रतन-'नहीं, सुना तो नहींऋ पर मेरा अनुमान है।'
जालपा-'नहीं रतन-' मैं इस पर ज़रा भी विश्वास नहीं करती। यह बुराई उनमें नहीं है, और चाहे जितनी बुराइयां हों। मुझे उन पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है।'
उसका स्वागत करता। कम-से-कम दस-पांच दिन की मुहलत तो मिल जाती, मगर बुलाने से तो मौत भी नहीं आती! वह तो उसी समय आती है, जब हम उसके लिए बिलकुल तैयार नहीं होते। ईश्वर कहीं से कोई तार ही भिजवा दे, कोई ऐसा मित्र भी नज़र नहीं आता था, जो उसके नाम फर्जी तार भेज देता। वह इन्हीं चिंताओं में करवटें बदल रहा था कि जालपा की आंख खुल गई। रमा ने तुरंत चादर से मुंह छिपा लिया, मानो बेखबर सो
रहा है। जालपा ने धीरे से चादर हटाकर उसका मुंह