दीनदयाल, 'आख़िर चलने में हरज ही क्या है। शहजादी और बासन्ती दोनों आई हुई हैं। उनके साथ हंस-बोलकर जी बहलता रहेगा।
जालपा-'यहां लाला और अम्मांजी को अकेली छोड़कर जाने को मेरा जी नहीं चाहता। जब रोना ही लिखा है, तो रोऊंगी।'
दीनदयाल, 'यह बात क्या हुई, सुनते हैं कुछ कर्ज़ हो गया था, कोई कहता है, सरकारी रकम खा गए थे।'
जालपा-'जिसने आपसे यह कहा, उसने सरासर झूठ कहा।'
दीनदयाल-'तो फिर क्यों चले गए? '
जालपा-'यह मैं बिलकुल नहीं जानती। मुझे बार-बार ख़ुद यही शंका होती है।'
दीनदयाल-'लाला दयानाथ से तो झगडानहीं हुआ? '
जालपा-'लालाजी के सामने तो वह सिर तक नहीं उठाते, पान तक नहीं खाते, भला झगडा क्या करेंगे। उन्हें घूमने का शौक था। सोचा होगा,यों तो कोई जाने न देगा, चलो भाग चलें।'
दीनदयाल-' शायद ऐसा ही
ने जालपा के मन में एक संदेह पैदा कर दिया था। वह उसी संदेह को मिटाना चाहती थी। ज़रा देर बाद उसने पूछा, 'सर्राफ के तो अभी सब रूपये अदा न हुए होंगे? '
रमानाथ-'अब थोड़े ही बाकी हैं।'
जालपा-'कितने बाकी होंगे, कुछ हिसाब-किताब लिखते हो? '
रमानाथ-'हां, लिखता क्यों नहीं। सात सौ से कुछ कम ही होंगे।'
जालपा-'तब तो पूरी गठरी है, तुमने कहीं रतन के रूपये तो नहीं दे दिए? '
रमा दिल में कांप रहा था, कहीं जालपा यह प्रश्न न कर बैठे।