सर्राफ को क्या जवाब दिया जाय- बडी मुश्किलों से कुछ गहने लौटाने पर राजी हुआ, मगर बहू से गहने मांगे कौन- यह सब तुम्हारी ही करतूत है।
रमानाथ ने इस आक्षेप को अपने ऊपर से हटाते हुए कहा--मैंने क्या खर्च किया- जो कुछ किया बाबूजी ने किया। हां, जो कुछ मुझसे कहा गया, वह मैंने किया।
रमानाथ के कथन में बहुत कुछ सत्य था। यदि दयानाथ की इच्छा न होती तो रमा क्या कर सकता था?जो कुछ हुआ उन्हीं की अनुमति से हुआ। रमानाथ पर इल्जाम रखने से तो कोई समस्या हल न हो सकती थी। बोले--मैं तुम्हें इल्जाम नहीं देता भाई। किया तो मैंने ही, मगर यह बला तो किसी तरह सिर से टालनी चाहिए। सर्राफ का तकाजा है। कल उसका आदमी आवेगा। उसे क्या जवाब दिया जाएगा? मेरी समझ में तो यही एक उपाय है कि उतने रूपये के गहने उसे लौटा दिए जायं। गहने लौटा देने में भी वह झंझट
मानकी ने रोनी सूरत बनाकर कहा--नहीं, चन्द्रहार नहीं आया।
एक महिला बोली--अरे, चन्द्रहार नहीं आया?
दीनदयाल ने गंभीर भाव से कहा--और सभी चीजें तो हैं, एक चन्द्रहार ही तो नहीं है।
उसी महिला ने मुंह बनाकर कहा--चन्द्रहार की बात ही और है!
मानकी ने चढ़ाव को सामने से हटाकर कहा--बेचारी के भाग में चन्द्रहार लिखा ही नहीं है।
इस गोलाकार जमघट के पीछे अंधेरे में आशा और आकांक्षा की मूर्ति - सी जालपा भी खड़ी थी। और सब गहनों के नाम कान में आते