मुंह छिपा ले, पर रतन ने दूर ही से पहचान लिया, मोटर रोककर बोली,कहां जा रही हो बहन, 'यह पीठ पर बेग कैसा है?'
जालपा ने घूंघट हटा लिया और निद्यशंक होकर बोली,'गंगा-स्नान करने जा रही हूं।'
रतन-'मैं तो स्नान करके लौट आई, लेकिन चलो, तुम्हारे साथ चलती हूं। तुम्हें घर पहुंचाकर लौट जाऊंगी। बेग रख दो।'
जालपा-'नहीं-नहीं, यह भारी नहीं है। तुम जाओ, तुम्हें देर होगी। मैं चली जाऊंगी।'
मगर रतन ने न माना, कार से उतरकर उसके हाथ से बेग ले ही लिया
और कार में रखती हुई बोली, 'क्या भरा है तुमने इसमें, बहुत भारी है। खोलकर देखूं?'
जालपा-'इसमें तुम्हारे देखने लायक कोई चीज़ नहीं है।'
बेग में ताला न लगा था। रतन ने खोलकर देखा, तो विस्मित होकर बोली, 'इन चीज़ों को कहां लिये जाती हो?'
जालपा ने कार पर बैठते हुए कहा, 'इन्हें गंगा में बहा दूंगी।'
रूपये में आधा पाव भी फिर गया, तो सैकड़ों के मत्थे गई। दस-पांच रूपये का बल खा जाने में उन्हें क्या आपत्ति हो सकती थी। रमा को आज यह नई बात मालूम हुई। सोचा, आख़िर सुबह को मैं घर ही पर बैठा रहता हूं। अगर यहां आकर बैठ जाऊं तो रोज़ दसपांच रूपये हाथ आ जायं। फिर तो छः महीने में यह सारा झगडासाफ हो जाय। मान लो रोज़ यह चांदी न होगी, पंद्रह न सही, दस मिलेंगे, पांच मिलेंगे। अगर सुबह को रोज़ पांच रूपये मिल जायं और इतने ही दिनभर में और मिल