कपट का आरंभ पहले उसी की ओर से हुआ। गंगा का तट आ पहुंचा। कार रूक गई। जालपा उतरी और बेग को उठाने लगी, किंतु रतन ने उसका हाथ हटाकर कहा, 'नहीं, मैं इसे न ले जाने दूंगी। समझ लो कि डूब गए।'
जालपा-'ऐसा कैसे समझ लूं।'
रतन-'मुझ पर दया करो, बहन के नाते।'
जालपा-'बहन के नाते तुम्हारे पैर धो सकती हूं, मगर इन कांटों को ह्रदय में नहीं रख सकती।'
रतन ने भौंहें सिकोड़कर कहा,किसी तरह न मानोगी?'
जालपा ने स्थिर भाव से कहा, 'हां, किसी तरह नहीं।'
रतन ने विरक्त होकर मुंह उधर लिया। जालपा ने बेग उठा लिया और तेज़ी से घाट से उतरकर जल-तट तक पहुंच गई, फिर बेग को उठाकर पानी में फेंक दिया। अपनी निर्बलता पर यह विजय पाकर उसका मुख प्रदीप्त हो गया। आज उसे जितना गर्व और आनंद हुआ, उतना इन चीज़ों
का पान भी न खाया था। जालपा ने कई बार कहा, चलो कहीं घूम आवें, तो उसे भी उसने बातों में ही टाला। बस, कल का दिन और था। कल आकर रतन कंगन मांगेगी तो उसे वह क्या जवाब देगा। दफ्तर से आकर वह इसी सोच में बैठा हुआ था। क्या वह एक महीना-भर के लिए और न मान जायगी। इतने दिन वह और न बोलती तो शायद वह उससे उऋण हो जाता। उसे विश्वास था कि मैं उससे चिकनी-चुपड़ी बातें करके राज़ी कर लूंगा। अगर उसने ज़िद की तो मैं उससे कह दूंगा, सर्राफ