रमा ने मुस्कराकर कहा, 'पहले तो कठिन लगती थी, पर अब तो आसान मालूम होती है।' देवीदीन-' 'जिस दिन पराइमर खतम होगी, महाबीरजी को सवा सेर लडडू चढ़ाऊंगा। पराई-मर का मतलब है, पराई स्त्री मर जाय। मैं कहता हूं, हमारीमर, पराई के मरने से हमें क्या सुख! तुम्हारे बाल-बच्चे तो हैं न भैया?'
रमा ने इस भाव से कहा, 'मानो हैं, पर न होने के बराबर हैं,हां, हैं तो!'
'कोई चिट्ठी-चपाती आई थी?'
'ना!'
'और न तुमने लिखी- अरे! तीन महीने से कोई चिट्ठी ही नहीं भेजी? घबडाते न होंगे लोग?'
'जब तक यहां कोई ठिकाना न लग जाय, क्या पत्र लिखूं।'
'अरे भले आदमी, इतना तो लिख दो कि मैं यहां कुशल से हूं। घर से भाग आए थे, उन लोगों को कितनी चिंता हो रही होगी! मां-बाप तो हैं न?'
'हां, हैं तो।'
देवीदीन ने गिड़गिडाकर कहा,'तो भैया, आज ही चिट्ठी डाल दो, मेरी बात मानो।'
रमा ने आखें गाड़कर कहा, 'खजांची बाबू चले गए! तुमने मुझसे कहा क्यों नहीं- अभी कितनी दूर गए होंगे?'
चपरासी-'सड़क के नुक्कड़ तक पहुंचे होंगे।'
रमानाथ-'यह आमदनी कैसे जमा होगी?'
चपरासी-'हुकुम हो तो बुला लाऊं?'
रमानाथ-'अजी, जाओ भी, अब तक तो कहा नहीं, अब उन्हें आधे रास्ते से बुलाने जाओगे। हो तुम भी निरे बछिया के ताऊब आज ज्यादा छान गए थे क्या? ख़ैर, रूपये इसी दराज़ में रखे रहेंगे। तुम्हारी ज़िम्मेदारी रहेगी।'
चपरासी-'नहीं बाबू साहब,