जाती थी, तो प्रसन्न हो जाती थी, और मैं प्रेम की तरंग में आगा-पीछा कुछ न सोचता था।'
देवीदीन के मुंह से मानो आप-ही-आप निकल आया, 'सरकारी रकम तो नहीं उडादी?'
रमा को रोमांच हो आया। छाती धक-से हो गई। वह सरकारी रकम की बात उससे छिपाना चाहता था। देवीदीन के इस प्रश्न ने मानो उस पर छापा मार दिया। वह कुशल सैनिक की भांति अपनी सेना को घाटियों से, जासूसों की आंख बचाकर, निकाल ले जाना चाहता था, पर इस छापे ने उसकी सेना को अस्त- व्यस्त कर दिया। उसके चेहरे का रंग उड़ गया। वह एकाएक कुछ निश्चय न कर सका कि इसका क्या जवाब दूं।
देवीदीन ने उसके मन का भाव भांपकर कहा, 'प्रेम बडा बेढब होता है, भैया! बड़े-बडे चूक जाते हैं, तुम तो अभी लङके हो ग़बन के हज़ारों मुकदमे हर साल होते हैं। तहकीकात की जाय, तो सबका कारण एक ही होगा,गहना।
रमानाथ-'अभी तैयार नहीं था, मैंने समझा रूपये लेता चलूं जिसमें उन्हें तस्कीन हो जाय।
जालपा-'क्या कहा सर्राफ ने?'
रमानाथ-'कहा क्या, आज-कल करता है। अभी रतन देवी आइ नहीं?'
जालपा-'आती ही होगी, उसे चैन कहां?'
जब चिराग जले तक रतन न आई, तो रमा ने समझा अब न आएगी। रूपये आल्मारी में रख दिए और घूमने चल दिया। अभी उसे गए दस मिनट भी न हुए होंगे कि रतन आ पहुंची और आते-ही-आते बोली,कंगन तो आ गए होंगे?'
जालपा-'हां