रमा ने चौंककर पूछा, 'क्या दस बज गए?'
देवीदीन-' 'दस नहीं, ग्यारह का अमल होगा।'
रमा चलने को तैयार हुआ, लेकिन द्वार तक आकर रूक गया।
देवीदीन ने पूछा,'क्यों खड़े कैसे हो गए?'
''तुम्हीं चले जाओ, मैं जाकर क्या करूंगा!'
''क्या डर रहे हो?'
''नहीं, डर नहीं रहा हूं, मगर क्या फायदा?'
'मैं अकेले जाकर क्या करूंगा! मुझे क्या मालूम, तुम्हें कौन कपडा पसंद है। चलकर अपनी पसंद से ले लो। वहीं दरजी को दे देंगे।'
'तुम जैसा कपडा चाहे ले लेना। मुझे सब पंसद है।'
'तुम्हें डर किस बात का है? पुलिस तुम्हारा कुछ नहीं करेगी। कोई तुम्हारी तरफ ताकेगा भी नहीं।''
'मैं डर नहीं रहा हूं दादा, जाने की इच्छा नहीं है।'
'डर नहीं रहे हो, तो क्या कर रहे हो कह रहा हूं कि कोई तुम्हें कुछ न कहेगा, इसका मेरा जिम्मा, मुदा तुम्हारी जान निकली जाती है!'
वकील--'नान्सेसं ! अपने-अपने देश की प्रथा है। आप एक युवती को किसी युवक के साथ एकांत में विचरते देखकर दांतों तले उंगली दबाते हैं। आपका अंप्तःकरण इतना मलिन हो गया है कि स्त्री-पुरूष को एक जगह देखकर आप संदेह किए बिना रह ही नहीं सकते, पर जहां लङके और लड़कियां एक साथ शिक्षा पाते हैं, वहां यह जाति-भेद बहुत महत्व की वस्तु नहीं रह जाती,आपस में स्नेह और सहानुभूति की इतनी बातें पैदा हो जाती हैं कि कामुकता का अंश बहुत थोडारह जाता है। यह समझ