लेकिन आगे चलकर बहुमत किसानों और मजूरों ही का हो जाएगा। देवीदीन ने मुस्कराकर कहा,' भैया, तुम भी इन बातों को समझते हो यही मैंने भी सोचा था। भगवान करे, कुछ दिन और जिऊं। मेरा पहला सवाल यह होगा कि बिलायती चीज़ों पर दुगुना महसूल लगाया जाय और मोटरों पर चौगुना। अच्छा अब भोजन बनाओ। सांझ को चलकर कपड़े दरजी को दे देंगे। मैं भी जब तक खा लूं।'

शाम को देवीदीन ने आकर कहा, 'चलो भैया, अब तो अंधेरा हो गया।'

रमा सिर पर हाथ धरे बैठा हुआ था। मुख पर उदासी छाई हुई थी। बोला, 'दादा, मैं घर न जाऊंगा।'

देवीदीन ने चकित होकर पूछा, 'क्यों क्या बात हुई?'

रमा की आंखें सजल हो गई। बोला, 'कौन?सा मुंह लेकर जाऊं, दादा! मुझे तो डूब मरना चाहिए था।'

यह कहते-कहते वह खुलकर रो पड़ा। वह वेदना जो अब तक मूर्छित पड़ी थी,


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रतन-'आपको पेंग मारना नहीं आता, कभी झूला नहीं झूले?'

रमा ने झिझकते हुए कहा, 'हां, इधर तो वर्षो से नहीं बैठा।'

रतन-'तो आप इन बच्चों को संभालकर बैठिए, मैं आपको झुलाऊंगी।'

अगर उस डाल से न छू ले तो कहिएगा! रमा के प्राण सूख गए। बोला,आजतो बहुत देर हो गई है, फिर कभी आऊंगा। '

रतन-'अजी अभी क्या देर हो गई है, दस भी नहीं बजे, घबडाइए नहीं, अभी बहुत रात पड़ी है। खूब झूलकर जाइएगा। कल जालपा को लाइएगा, हम दोनों झूलेंगे।'


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