नहीं किया, वह आज न करेंगे। उन्हें जालपा से गहने मांगने में कोई संकोच न होगा और यही वह न चाहता था। वह पछता रहा था कि मैंने क्यों जालपा से डींगें मारीं। अब अपने मुंह की लाली रखने का सारा भार उसी पर था। जालपा की अनुपम छवि ने पहले ही दिन उस पर मोहिनी डाल दी थी। वह अपने सौभाग्य पर फूला न समाता था। क्या यह घर ऐसी अनन्य सुंदरी के योग्य था? जालपा के पिता पांच रूपये के नौकर थे, पर जालपा ने कभी अपने घर में झाड़ू न लगाई थी। कभी अपनी धोती न छांटी थी। अपना बिछावन न बिछाया था। यहां तक कि अपनी के धोती की खींच तक न सी थी। दयानाथ पचास रूपये पाते थे, पर यहां केवल चौका-बासन करने के लिए महरी थी। बाकी सारा काम अपने ही हाथों करना पड़ता था। जालपा शहर और देहात का फर्क क्या जाने! शहर में रहने का उसे कभी अवसर ही न पडाथा। वह
उनकी समझ में न आया हो बासन्ती ने कहा--जी चाहता है, कारीगर के हाथ चूम लूं।
शहजादी बोली--चढ़ावा ऐसा ही होना चाहिए, कि देखने वाले भड़क उठें।
बासन्ती--तुम्हारी सास बडी चतुर जान पड़ती हैं, कोई चीज नहीं छोड़ी।
जालपा ने मुंह उधरकर कहा--ऐसा ही होगा।
राधा--और तो सब कुछ है, केवल चन्द्रहार नहीं है।
शहजादी--एक चन्द्रहार के न होने से क्या होता है बहन, उसकी जगह गुलूबंद तो है।
जालपा ने वक्रोक्ति के भाव से कहा--हां, देह में एक आंख के