की जुफल जोड़ी है। यही मेरे दोनों लाल हैं। बुढिया के प्रति आज रमा के ह्रदय में असीम श्रद्धा जाग्रत हुई। कितना पावन धैर्य है, कितनी विशाल वत्सलता, जिसने लकड़ी के इन दो टुकड़ों को जीवन प्रदान कर दिया है। रमा ने जग्गो को माया और लोभ में डूबी हुई, पैसे पर जान देने वाली, कोमल भावों से सर्वथा विहीन समझ रक्खा था। आज उसे विदित हुआ कि उसका ह्रदय कितना स्नेहमय, कितना कोमल, कितना मनस्वी है। बुढिया ने उसके मुंह की ओर देखा, तो न जाने क्यों उसका मात!-ह्रदय उसे गले लगाने के लिए अधीर हो उठा। दोनों के ह्रदय प्रेम के सूत्र में बंध गए। एक ओर पुत्र-स्नेह था,दूसरी ओर मातृ-भक्ति। वह मालिन्य जो अब तक गुप्त भाव से दोनों को पृथक किए हुए था, आज एकाएक दूर हो गया। बुढिया ने कहा, 'मुंह-हाथ धो लिया है न बेटा, बडे मीठे संतरे लाई हूं, एक लेकर चखो तो।'

रमा ने संतरा खाते हुए कहा, 'आज से मैं तुम्हें अम्मां कहा करूंगा।'


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रमानाथ-'मैं उन ऋषियों के भक्तों में नहीं हूं।'

जालपा-'वह तो तब मालूम होता, जब मैं तुम्हारे ह्रदय में पैठकर देखती।'

रमानाथ-'वहां तुम अपनी ही प्रतिमा देखतीं।'

रात को जालपा ने एक भयंकर स्वप्न देखा, वह चिल्ला पड़ी। रमा ने चौंककर पूछा,'क्या है? जालपा, क्या स्वप्न देख रही हो? '

जालपा ने इधर-उधर घबडाई हुई आंखों से देखकर कहा,'बडे संकट में जान पड़ी थी। न जाने कैसा सपना देख रही थी! '

रमानाथ-'क्या देखा?'

जालपा-'क्या बताऊं, कुछ कहा


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