तब तो यह और भी ऊल-जलूल बकने लगते हैं। उस वक्त हंसी रोकनी मुश्किल हो जाती है। आज सबेरे कहने लगे,मेरा पेट भक हो गया,मेरा पेट भक हो गया। इसकी रट लगा दी। इसका आशय क्या था, न मैं समझ सकी,
न अम्मां समझ सकीं, पर वह बराबर यही रटे जाते थे,पेट भक हो गया! पेट भक हो गया! आओ कमरे में चलें।'
रतन-'मेरे साथ न चलोगी?'
जालपा-'आज तो न चल सयंगी, बहन।'
'कल आओगी?'
'कह नहीं सकती। दादा का जी कुछ हल्का रहा, तो आऊंगी।'
'नहीं भाई, जरूर आना। तुमसे एक सलाह करनी है।'
'क्या सलाह है?'
'मन्नी कहते हैं, यहां अब रहकर क्या करना है, घर चलो। बंगले को बेच देने को कहते हैं।'
जालपा ने एकाएक ठिठककर उसका हाथ पकड़ लिया और बोली, 'यह तो तुमने बुरी ख़बर सुनाई, बहन! मुझे इस दशा
से देखती हुई बोली, 'सच बताना, तुम अब भी मुझे वैसे ही चाहते हो, जैसे पहले चाहते थे?देखो, सच कहना, बोलो!'
रमा ने जालपा के गले से चिमटकर कहा, 'उससे कहीं अधिक, लाख गुना!'
जालपा ने हंसकर कहा, 'झूठ! बिलकुल झूठ! सोलहों आना झूठ!'
रमानाथ-'यह तुम्हारी ज़बरदस्ती है। आख़िर ऐसा तुम्हें कैसे जान पडा?'
जालपा-'आंखों से देखती हूं और कैसे जान पड़ा। तुमने मेरे पास बैठने की कसम खा ली है। जब देखो तुम गुमसुम रहते हो मुझसे प्रेम होता,