दारोग़ा-'अच्छी बात है, तुम्हें भी यहां खासे मोटे जेवर मिल जायंगे!'
एकाएक बूढ़ा देवीदीन आकर खडाहो गया। दारोग़ा ने कठोर स्वर में कहा, 'क्या काम है यहां?'
देवीदीन-'हुजूर को सलाम करने चला आया। इन बेचारों पर दया की नज़र रहे हुजूर, बेचारे बडे सीधे आदमी हैं।'
दारोग़ा -'बचा सरकारी मुलज़िम को घर में छिपाते हो, उस पर सिफारिश करने आए हो!'
देवीदीन-'मैं क्या सिफारिस करूंगा हुजूर, दो कौड़ी का आदमी।'
दारोग़ा-'जानता है, इन पर वारंट है, सरकारी रूपये ग़बन कर गए हैं।'
देवीदीन-'हुजूर, भूल-चूक आदमी से ही तो होती है। जवानी की उम्र है ही, ख़र्च हो गए होंगे।
यह कहते हुए देवीदीन ने पांच गिन्नियां कमर से निकालकर मेज़ पर रख दीं।
दारोग़ा ने तड़पकर कहा, 'यह क्या है?'
देवीदीन-'कुछ नहीं है, हुजूर को पान खाने को।'
दारोग़ा -'रिश्वत देना चाहता है! क्यों? कहो तो बचा, इसी इल्ज़ाम में भेज दूं।'
पा सके। गंगा की गोद के सिवा ऐसी जगह और कहां थी। अगर जीवित रहा, तो महीनेदो महीने में अवश्य ही पकड़ लिया जाएगा। उस समय उसकी क्या दशा होगी,वह हथकडियां और बेडियां पहने अदालत में खडाहोगा। सिपाहियों का एक दल उसके ऊपर सवार होगा। सारे शहर के लोग उसका तमाशा देखने जाएंगे। जालपा भी जाएगी। रतन भी जाएगी। उसके पिता, संबंधी, मित्र, अपने-पराए,सभी भिन्न-भिन्न भावों से उसकी दुर्दशा का तमाशा देखेंगे। नहीं, वह अपनी मिट्टी यों न ख़राब करेगा, न करेगा।