जग्गो-'दारोग़ाजी भी बडे वह हैं। कहां तो कहा था कि इतना लेंगे, कहां लेकर चल दिए!'
देवीदीन-'इसीलिए तो बैठा हूं कि आवें तो दो-दो बातें कर लूं।'
जग्गो-'हां, फटकारना जरूर,जो अपनी बात का नहीं, वह अपने बाप का क्या होगा। मैं तो खरी कहूंगी। मेरा क्या कर लेंगे!'
देवीदीन-'दूकान पर कौन है?'
जग्गो-'बंद कर आई हूं। अभी बेचारे ने कुछ खाया भी नहीं। सबेरे से
वैसे ही हैं। चूल्हे में जाय वह तमासाब उसी के टिकट लेने तो जाते थे। न घर
से निकलते तो काहे को यह बला सिर पड़ती।
देवीदीन-'जो उधार ही से पराग भेज दिया तो?'
जग्गो-'तो चिट्ठी तो आवेगी ही। चलकर वहीं देख आवेंगे?'
देवीदीन-'(आंखों में आंसू भरकर) सज़ा हो जायगी?
जग्गो-'रूपया जमा कर देंगे तब काहे को होगी। सरकार अपने रूपये ही तो लेगी?
देवीदीन-'नहीं पगली, ऐसा नहीं होता। चोर माल लौटा दे तो वह छोड़ थोड़े ही दिया जाएगा।'
मैं भी तो वहीं चल रहा हूं। जब चाहे दे देना। क्या मेरे दस-पांच रूपये लेकर भाग जाओगे। कहां घर है?'
रमानाथ-'यहीं, प्रयाग ही में रहता हूं।'
बूढ़े ने भक्ति के भाव से कहा,मान्य है प्रयाग, धन्य है! मैं भी त्रिवेणी का स्नान करके आ रहा हूं, सचमुच देवताओं की पुरी है। तो कै रूपये निकालूं?'
रमा ने सकुचाते हुए कहा, 'मैं चलते ही चलते रूपया न दे सकूंगा, यह समझ लो।'
बूढ़े ने सरल भाव से कहा, 'अरे बाबूजी, मेरे दस-पांच रूपये लेकर तुम भाग थोड़े ही