हो! क्या पुलिस वालों के चकमे में आ गए? इसमें कोई न कोई चाल जरूर छिपी होगी।'
रमा ने इत्मीनान के साथ कहा, 'और बात नहीं, एक मुकदमे में शहादत देनी पड़ेगी।'
देवीदीन ने संशय से सिर हिलाकर कहा, 'झूठा मुकदमा होगा?'
रमानाथ-'नहीं दादा, बिलकुल सच्चा मामला है। मैंने पहले ही पूछ लिया है।'
देवीदीन की शंका शांत न हुई। बोला, 'मैं इस बारे में और कुछ नहीं कह सकता भैया, ज़रा सोच-समझकर काम करना। अगर मेरे रूपयों को डरते हो,तो यही समझ लो कि देवीदीन ने अगर रूपयों की परवा की होती, तो आज लखपति होता। इन्हीं हाथों से सौ-सौ रूपये रोज़ कमाए और सब-के-सब उडादिए हैं। किस मुकदमे में सहादत देनी है? कुछ मालूम हुआ?'
दारोग़ाजी ने रमा को जवाब देने का अवसर न देकर कहा, 'वही डकैतियों वाला मुआमला है जिसमें कई ग़रीब आदमियों की जान
के पीछे जान दे दें, घर के आदमियों को भूखा मारें, घर की चीज़ें बेचेंब और कहां तक कहूं, अपनी आबरू तक बेच दें। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सबको यही रोग लगा हुआ है। कलकत्ता में कहां काम करते हो, भैया?'
रमानाथ-'अभी तो जा रहा हूं। देखूं कोई नौकरी-चाकरी मिलती है या नहीं?'
देवीदीन-'तो फिर मेरे ही घर ठहरना। दो कोठरियां हैं, सामने दालान है, एक कोठरी ऊपर है। आज बेचूं तो दस हज़ार मिलें। एक कोठरी तुम्हें दे दूंगा। जब कहीं काम मिल जाय, तो अपना