उदय ही नहीं हुई थी। गांव में कोई उत्सव होता, या कोई त्योहार पडता, तो वह उसी हार को पहनती। कोई दूसरा गहना उसकी आंखों में जंचता ही न था। एक दिन दीनदयाल लौटे, तो मानकी के लिए एक चन्द्रहार लाए। मानकी को यह साके बहुत दिनों से थी। यह हार पाकर वह मुग्ध हो गई। जालपा को अब अपना हार अच्छा न लगता, पिता से बोली--बाबूजी, मुझे भी ऐसा ही हार ला दीजिए।
दीनदयाल ने मुस्कराकर कहा-ला दूंगा, बेटी!
कब ला दीजिएगा
बहुत जल्दी ।
बाप के शब्दों से जालपा का मन न भरा।
उसने माता से जाकर कहा-अम्मांजी, मुझे भी अपना सा हार बनवा दो।
मां-वह तो बहुत रूपयों में बनेगा, बेटी!
जालपा-तुमने अपने लिए बनवाया है, मेरे लिए क्यों नहीं बनवातीं?
मां ने मुस्कराकर कहा-तेरे लिए तेरी ससुराल से आएगा।
यह हार छ सौ में बना था। इतने रूपये जमा
छोटे - से गांव में रहते थे। वह किसान न थे पर खेती करते थे। वह जमींदार न थे पर जमींदारी करते थे। थानेदार न थे पर थानेदारी करते थे। वह थे जमींदार के मुख्तार। गांव पर उन्हीं की धाक थी। उनके पास चार चपरासी थे, एक घोडा, कई गाएं- - भैंसें। वेतन कुल पांच रूपये पाते थे, जो उनके तंबाकू के खर्च को भी काफी न होता था। उनकी आय के और कौन से मार्ग थे, यह कौन जानता है। जालपा उन्हीं की लडकी थी। पहले उसके तीन भाई और थे, पर इस समय वह