जालपा ने फटकारकर कहा, 'खटिक हों या चमार हों, लेकिन हमसे और तुमसे सौगुने अच्छे हैं। एक परदेशी आदमी को छः महीने तक अपने घर में ठहराया, खिलाया, पिलाया। हममें है इतनी हिम्मत! यहां तो कोई मेहमान आ जाता है, तो वह भी भारी हो जाता है। अगर यह नीचे हैं, तो हम इनसे कहीं नीचे हैं।'
गोपी मुंह-हाथ धो चुका था। मिठाई खाता हुआ बोला, किसी को ठहरा लेने से कोई ऊंचा नहीं हो जाता। चमार कितना ही दानपुण्य करे, पर रहेगा तो चमार ही।'
जालपा-'मैं उस चमार को उस पंडित से अच्छा समझूंगी, जो हमेशा दूसरों का धन खाया करता है।'
जलपान करके गोपी नीचे चला गया। शहर घूमने की उसकी बडी इच्छा थी। जालपा की इच्छा कुछ खाने की न हुई। उसके सामने एक जटिल समस्या खड़ी थी,रमा को कैसे इस दलदल से निकाले। उस निंदा और उपहास की कल्पना ही से उसका
जागेश्वरी बैठे-बैठे झपकियां ले रही थी। चौंककर बोली, 'कहां चले गए थे? '
जालपा-'वह तो अब तक नहीं आए।'
जागेश्वरी--'अब तक नहीं आए? आधी रात तो हो गई होगी। जाते वक्त तुमसे कुछ कहा भी नहीं?'
जालपा-'कुछ नहीं।'
जागेश्वरी--'तुमने तो कुछ नहीं कहा?'
जालपा-'मैं भला क्यों कहती।'
जागेश्वरी--'तो मैं लालाजी को जगाऊं?'
जालपा-'इस वक्त ज़गाकर क्या कीजिएगा? आप चलकर कुछ खा लीजिए न।'
जागेश्वरी--'मुझसे अब कुछ न खाया जायगा।