'अरे! तुम हो जंगली? तुमने यह बाग़ लिया है?'
जगंली ठिगना-सा गठीला आदमी था, बोला,'हां दादा, ले लिया, पर कुछ है नहीं। डंड ही भरना पड़ेगा। तुम यहां कैसे आ गए?'
'कुछ नहीं, यों ही चला आया था। इस बंगले वाले आदमी क्या हुए?'
जंगली ने इधर-उधर देखकर कनबतियों में कहा, 'इसमें वही मुखबर टिका हुआ था। आज सब चले गए। सुनते हैं, पंद्रह-बीस दिन में आएंगे, जब फिर हाईकोर्ट में मुकदमा पेस होगा। पढ़े-लिखे आदमी भी ऐसे दगाबाज होते हैं, दादा! सरासर झूठी गवाही दी। न जाने इसके बाल-बच्चे हैं या नहीं,भगवान को भी नहीं डरा!'
जालपा वहीं खड़ी थी। देवीदीन ने जंगली को और ज़हर उगलने का अवसर न दिया। बोला,
'तो पंद्रह-बीस दिन में आएंगे, ख़ूब मालूम है?
जंगली-'हां, वही पहरे वाले कह रहे थे।'
'कुछ मालूम हुआ, कहां गए हैं?'
वह ऊपर जा रही थी कि रतन आ गई और उसे गले से लगाती हुई बोली, 'क्या अब तक कुछ पता नहीं चला? जालपा को इन शब्दों में स्नेह और सहानुभूति का एक सागर उमड़ता हुआ जान पड़ा। यह गैर होकर इतनी चिंतित है, और यहां अपने ही सास और ससुर हाथ धोकर पीछे पड़े हुए हैं। इन अपनों से गैर ही अच्छे।आंखों में आंसू भरकर बोली, 'अभी तो कुछ पता नहीं चला बहन! '
रतन-'यह बात क्या हुई, कुछ तुमसे तो कहा-सुनी नहीं हुई?'
जालपा-'ज़रा भी नहीं, कसम