तीस साल से बराबर बैठते चले आते थे। इसी जगह की बदलौत उन्होंने धन और यश दोनों ही कमाया था। उसे छोड़ते हुए क्यों न दुःख होता। चार्ज देकर जब वह विदा होने लगे तो रमा उनके साथ जीने के नीचे तक गया। खां साहब उसकी इस नम्रता से प्रसन्न हो गए। मुस्कराकर बोले--'हर एक बिल्टी पर एक आना बंधा हुआ है, खुली हुई बात है। लोग शौक से देते हैं। आप अमीर आदमी हैं, मगर रस्म न बिगाडिएगा। एक बार कोई रस्म टूट जाती है, तो उसका बंधना मुश्किल हो जाता है। इस एक आने में आधा चपरासियों का हक है। जो बडे बाबू पहले थे, वह पचीस रूपये महीना लेते थे, मगर यह कुछ नहीं लेते।'
रमा ने अरूचि प्रकट करते हुए कहा--'गंदा काम है, मैं सगाई से काम करना चाहता हूं।'
बूढ़े मियां ने हंसकर कहा--'अभी गंदा मालूम होता है, लेकिन फिर इसी में मज़ा आएगा।'
लिए सोने के चूड़े बनवाए गए थे। दादी जब उसे गोद में खिलाने लगती, तो गहनों की ही चर्चा करती--तेरा दूल्हा तेरे लिए बडे सुंदर गहने लाएगा। ठुमक-ठुमककर चलेगी। जालपा पूछती--चांदी के होंगे कि सोने के, दादीजी?
दादी कहती--सोने के होंगे बेटी, चांदी के क्यों लाएगा- चांदी के लाए तो तुम उठाकर उसके मुंह पर पटक देना।
मानकी छेड़कर कहती--चांदी के तो लाएगा ही। सोने के उसे कहां मिले जाते हैं!
जालपा रोने लगती, इस बूढ़ी दादी, मानकी, घर की महरियां, पड़ोसिनें