खां साहब को विदा करके रमा अपनी कुर्सी पर आ बैठा और एक चपरासी से बोला--'इन लोगों से कहो, बरामदे के नीचे चले जाएं । एक-एक करके नंबरवार आवें, एक कागज पर सबके नाम नंबरवार लिख लिया करो।'
एक बनिया, जो दो घंटे से खडा था, खुश होकर बोला--'हां सरकार, यह बहुत अच्छा होगा।'
रमानाथ--'जो पहले आवे, उसका काम पहले होना चाहिए। बाकी लोग अपना नंबर आने तक बाहर रहें। यह नहीं कि सबसे पीछे वाले शोर मचाकर पहले आ जाएं और पहले वाले खड़े मुंह ताकते रहें। '
कई व्यापारियों ने कहा--'हां बाबूजी, यह इंतजाम हो जाए, तो बहुत अच्छा हो भभ्भड़ में बडी देर हो जाती है।'
इतना नियंत्रण रमा का रोब जमाने के लिए काफी था। वणिक-समाज में आज ही उसके रंग-ढंग की आलोचना और प्रशंसा होने लगी। किसी बड़े कॉलेज के प्रोफसर को इतनी ख्याति उम्रभर
और दीनदयाल--सब हंसते। उन लोगों के लिए यह विनोद का अशेष भंडार था।बालिका जब ज़रा और बडी हुई, तो गुडियों के ब्याह करने लगी। लडके की ओर से चढ़ावे जाते, दुलहिन को गहने पहनाती, डोली में बैठाकर विदा करती,कभी-कभी दुलहिन गुडिया अपने गुये दूल्हे से गहनों के लिए मान करती, गुड्डा बेचारा कहीं-न-कहीं से गहने लाकर स्त्री को प्रसन्न करता था। उन्हीं दिनोंबिसाती ने उसे वह चन्द्रहार दिया, जो अब तक उसके पास सुरक्षित था। ज़रा और बडी हुई तो बडी-बूढि.यों में बैठकर